• बल संवर्धन विशेषांक

बल संवर्धन विशेषांक

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धन बल को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले भी अब इस बात को स्वीकारने लगे हैं कि वास्तविक और सर्वश्रेष्ठ बल स्वास्थ्य ही है। भारतीय मनीषियों की 'सबसे प्रथम निरोगी कायाÓ उद्घोषणा अब विश्वभर के लोगों की समझ में आती जा रही है। अब लोगों का एक ओर जहां आधुनिक कृत्रिम रहन-सहन से विश्वास उठता जा रहा है, वही स्वास्थ्यप्रद खान-पान की तरफ रुझान बढऩे लगा है। लेकिन यह रुझान पाश्चात्य देशों के निवासियों में तेजी से बढ़ रहा है, जहां के लोग अत्याधुनिक रहन-सहन तथा अत्याधुनिकता के नाम पर प्रचलित खान-पान से अपने स्वास्थ्य को खोते जाने को विवश हो गये हैं। एलोपैथी का स्वर्ग-अमेरिका जहां की कुल आबादी 23 करोड़ का पांचवां हिस्सा मनोरोगों की मार से कराह रहा है। वहां के पांच करोड़ स्त्री-पुरुष निरंतर रहने वाले दर्द को दबाने  के लिए 'पेन किलर्सÓ दबाइयों का सेवन करते रहते हैं। कृत्रिम और अप्राकृतिक जीवन शैली की वजह से अमेरिका के 10 प्रतिशत लोग अपने मल उत्सर्जन पर नियंत्रण खो बैठे हैं, जिसकी वजह से वे कमर में एक-एक थैली लटकाए चलते हैं जो उनके मल से भरती रहती है। एलोपैथी से ही यदि रोग निवारण तथा सुखद जीवन सम्भव होता, तब क्या सबसे समृद्ध राष्ट्र के लोगों का स्वास्थ्य इस तरह असाध्य लोगों के घेरे में होता? यही कारण है कि तनिक आराम लेकिन बड़ा साइड इफेक्ट पहुंचाने वाली एलोपैथी को अब संकट का समाधान नहीं माना जा रहा है, और यही कारण है, कि आयुर्वेद सहित अन्य निरापद पद्धतियों के प्रति विश्व भर में विश्वास जमता जा रहा है।
    यह बड़े गौरव की बात है कि हमारे मनीषियों ने प्रकृति के रहस्यों को समझकर हमें स्वास्थ्य एवं सुखी जीवन का रास्ता आयुर्वेद केे माध्यम से सुझाया, अब यह दोष तो हमारा ही रहा कि अपने पूर्वजों के अमूल्य सुझावों को अनुपयोगी एवं आधुनिक जीवन में 'अनफिटÓ मान बैठे और सत्तू, पना और छाछ जैसी उपयोगी और सस्ते खाद्य पदार्थों को गंवारु खाद्य, जबकि महंगे पिज्जा, कोका कोला आदि को वर्तमान जीवन शैली के अनुरुप मानने लगे हैं। क्या इस बात को झुठलाया जा सकता है  कि सत्तू और पना शरीर के लिए बेहद उपयोगी जबकि पिज्जा या कोका कोला अन्तत: शरीर को तरह-तरह के छोटे-बड़े रोगों को आमंत्रित करने का ही काम करते हैं, यह तो एक उदाहरण मात्र है। यह बात हमें समझनी चाहिए कि आज नहीं तो कल हमारे भारत की भोजन परम्परा, रहन-सहन परम्परा, स्वास्थ्य संवर्धन की परम्परा सारी दुनिया को मानना ही पड़ेगा, फिर क्यों न हम आज से ही उन्हें समझना और अपनाना शुरु कर दें ताकि अपना और आने वाली पीढी का भविष्य सुखी और स्वस्थ बना सके।
    हमारा यह प्रयास हर अंक में रहता है कि पाठकों का अपने प्राचीन लुप्त प्राय: ज्ञान और रहस्य के घेरे में फंसे हिस्सों को उजागर करते रहें ताकि भूला विसरा और तितर-बितर हुआ अनुभव एक सूत्र में बंध सके। हम अपने प्रयास में कितने सफल हो पा रहे हैं, इसका सही आंकलन तो नहीं कर सकते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी जब टेलीविजन के चक्रव्यूह में अधिकांश भारतीय अर्थहीन, भौंडे सारयल्सम उलझकर रह गये हैं, वही ज्ञानवर्धक तथा उपयोगी पत्रिकाओं का पाठक वर्ग अब भी कम नहीं हुआ है, यह अच्छी बात है।
    प्रस्तुत अंक में अनेकानेक ऐसे नुस्खों को प्रकाशित किया गया है, जो सरल भी हैं तथा सफल भी की लेकिन जिनकी जानकारी आम लोगों से लेकर चिकित्सकों तक को प्राय: नहीं रहती। विभिन्न रोगों की कारगर चिकित्सा विस्तृत रूप में भी समझायी गयी है। सभी स्थायी स्तम्भ बहुमूल्य सामग्री से भरपूर हैं, जो पाठकों को उपयोगिता के साथ-साथ नवीनता का अहसास भी करा सकेंगे।
    हमें विश्वास है कि यह अंक पाठकों को अच्छा लगेगा।
    निरोग सुख को उत्तरोत्तर उपयोगी और आकर्षक बनाने की परम्परा में हम कितने सफल हो सके हैं, इसकी जानकारी तो हमें आपके पत्रों, वाट्सएप मैसेज तथा फोन काल्स से ही प्राप्त होगी।

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