• नवंबर-दिसंबर 2015

नवंबर-दिसंबर 2015

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समय करवट बदल रहा है। भारत की सही तस्वीर अब दुनिया के सामने आने लगी है। अनपढ़, गंवार और असभ्य देष के रूप में समझने वाले अब भारत को सुसंस्कृत, समृद्ध ज्ञान से सम्पन्न देष के रूप में देखने लगे हैं। भारतीयों के ज्ञान-कौषल का अब दुष्मन भी लोहा मानने लगे हैं। यहां का समृद्ध पुरातन ज्ञान सुन्दर भविश्य के आधार के रूप में मान्यता पाने लगा है।
आयुर्वेद आज निरापद और श्रेश्ठ चिकित्सा पद्धति के रूप में देखी जा रही है, वहीं   योग-ध्यान और प्राणायाम को तन और मन की सेहत के लिए उपयोगी माना जाने लगा है।
दुनिया भर में योग का डंका बज रहा है। संयुक्त राश्ट्र संघ के अधिकांष सदस्य योग के महत्व को जान-समझ लिया है। और विष्व भावना का सम्मान करते हुए 21 जून को ‘विष्व योग दिवस’’ घोशित करते हुए संयुक्त राश्ट्र संघ ने भारत की इस प्राचीन विद्या को स्वस्थ मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण मान लिया है। आज ‘जीवन के संविधान’ के रूप में स्वीकार किये जाने लगे हैं।
हमारे धार्मिक ग्रंथ अवसाद, कुण्ठा, हताषा, निराषा और काम के बोझ से दबे मानव के लिए श्रीमद्भगवद् गीता प्रेरणादायी सिद्ध हो रही है। कट्टर यहूदी और ईसाई जिनमें दुनिया के नामी उद्योगपति भी षामिल हैं, अपने जीवन और व्यवसाय की समस्याओं का हल ढूंढने के लिए ‘गीता’ का ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। आज दुनिया के श्रेश्ठ प्रबन्धकीय संस्थानों में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाने लगा है। भारतीय ज्ञान को समझने और सीखने की आज सारी दुनिया में मानों होड़ सी लगी हुई है।
आयुर्वेद हो या योग-ध्यान व प्राणायाम हो अथवा वैदिक गणित या हमारे धार्मिक ग्रंथ, वास्तव में यह सब विज्ञान हैं, वैज्ञानिक तथ्यों को अपने में समाये हुए हैं। इन सभी का        संबंध मानव जीवन के सुखद और सुन्दर भविश्य से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। दुनियाभर के विद्वान अब इस तथ्य को भली प्रकार से समझने भी लगे हैं। यूनेस्को ने वैदिक मंत्रोच्चारण पद्धति को ‘विष्व धरोहर’ के रूप में माना है और इसीलिए संयुक्त राश्ट्र अधिवेषन के सत्र का षुभारम्भ भी वैदिक मंत्रों के साथ हो रहा है।


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